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रांची : फ्लावर नहीं फायर है पुष्पा मिंज, कठिन हालात और पुष्पा के हौसले के बीच जारी है जंग

Ranchi : ये कहानी है पुष्पा मिंज की. इसके गले में कभी चमचमाता सोने का मेडल और हाथों में सुनहरी ट्रॉफी शोभा देती थी, वही आज हालात ऐसे हैं कि उसी हाथों से पुष्पा सब्जी तौलकर लोगों को बेचती रहती है. अपने थ्रो बॉल से कभी विरोधी खिलाड़ियों को धराशयी करने वाली लड़की आज अपने हाथों में सब्जी लेकर आवाज देती है कि लौकी ले लो… सब्जी ले लो. ये वही पुष्पा मिंज है जिसने कभी देश और प्रदेश को सोना जीतकर दिया था. समय बदल गये और हालात भी बदल गये. मजबूरी में आज वही हाथ बॉल थामने के बजाए तराजू थाम लिया है. जीवन की ये कड़वी सच्चाई है कि पेट की आग बहुत बुरी होती है भइया. मेडल से पेट नहीं भरता. पेट की आग बुझाने के लिए रोटी चाहिए और रोटी के लिए कमाना पड़ता है.

पुष्पा की झोली में हैं कई पदक
भले ही आज पुष्पा मिंज सब्जी बेचती हैं लेकिन उसकी झोली में थाईलैंड, कंबोडिया और नेपाल में खेले गये अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में भारत के लिए जीते हुए गोल्ड मेडल हैं. उसके सीने में तिरंगा को और ऊंचा उठाने की आग लगी हुई है. पुष्पा, फ्लावर नहीं है बल्कि फायर है. जब तक पुष्पा थ्रो बॉल के कोर्ट में रहीं, तब तक अपने खेल से विरोधियों में खलबली मचा दी. जब जिंदगी के मैदान में आई तो अपने सपनों का घर जला दी. खुद को मेहनत और मजदूरी की आग में झोंक दी. पुष्पा मिंज चट्टानी इरादा रखने वाली एक साहसी लड़की है.

अब पुष्पा के हाथों में बॉल के बदले सब्जी
राजधानी रांची के कडरू फ्लाईओवर के नीचे रेलवे लाइन के किनारे पुष्पा मिंज रोज सुबह 6 बजे से 11 बजे तक सब्जी बेचती है. एक हाथ में तराजू, दूसरे में उम्मीद की थैली लिए वह ग्राहकों को आवाज देती है. भइया लौकी ले लो…! किसी को यकीन नहीं होता कि यह वही लड़की है जिसने भारत के लिए तीन अलग-अलग देशों में गोल्ड मेडल जीतकर तिरंगा फहराया है. रांची से सटे नारकोपी गांव की रहने वाली पुष्पा मिंज के माता-पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं. लेकिन उनके दिये संस्कार, साहस और सांस्कृतिक जड़ें इतनी मजबूत रही हैं कि आर्थिक बदहाली, सामाजिक उपेक्षा और सरकार की अनदेखी के बावजूद भी पुष्पा जिंदगी के मैदान से बाहर नहीं हुई, बल्कि डटी हुई है. पुष्पा ने भूगोल (Geography) से पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की है.

भारत के लिए जीते कई गोल्ड
पुष्पा मिंज पढ़ाई के दौरान ही वह खेल के प्रति गंभीर हुईं और पारा थ्रो बॉल को अपना जीवन बना लिया. एक के बाद एक राज्यस्तरीय प्रतियोगिताएं, फिर राष्ट्रीय स्पर्धाएं और अंततः अंतरराष्ट्रीय मुकाबले– जहां उन्होंने देश का नाम रोशन किया और भारत के लिए कई गोल्ड मेडल जीतकर लाईं. पुष्पा के नाम पर उपलब्धियों की लंबी सूची है. नेपाल में आयोजित पारा थ्रो बॉल इंटरनेशनल चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतीं. थाईलैंड में भी पारा थ्रो बॉल इंटरनेशनल चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल हासिल किया. वहीं कंबोडिया में जाकर अपना शानदार प्रदर्शन करते हुए गोल्ड जीता. इसी तरह एशियन लेवल प्रतियोगिता में पुष्पा ने ब्रॉन्ज पर कब्जा जमाया. इसके अलावा पुष्पा मिंज ने राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर कई गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज मेडल जीते हैं. दुर्भाग्य से पुष्पा मिंज को खिलाड़ियों की उस फेहरिस्त में शामिल किया जा रहा है जो अपने देश के लिए सफलता अर्जित तो करते हैं लेकिन उन्हें अपनी ही जमीन पर पहचान नहीं मिलती.

आश्वासन मिला, सहयोग नहीं
जब पुष्पा मिंज पहली बार इंटरनेशनल गोल्ड जीतकर रांची लौटी थीं तो उस वक्त के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनकी पत्नी विधायक कल्पना सोरेन ने उन्हें बुलाकर सम्मानित किया था. इतने बड़े मंच, कैमरों की फ्लैश, कुछ शब्दों की सराहना और कुछ रुपयों की सौगात मिली, जो सम्मान के नाम पर ताना बनकर रह गया. पुष्पा कहती हैं कि तब लगा था जिंदगी बदल जाएगी लेकिन कुछ दिन बाद सबकुछ भुला दिया गया. जिन लोगों ने सहयोग का वादा किया था उन्होंने कभी पलट कर दोबारा देखा तक नहीं.
उधार लेकर टूर्नामेंट में शामिल होती हैं पुष्पा मिंज
जब पुष्पा मिंज को नेशनल या इंटरनेशनल टूर्नामेंट में हिस्सा लेना होता है तो वो परेशानी में फंस जाती हैं. आखिर उन्हें उधारी लेकर टूर्नामेंट में शामिल होना पड़ता है. पुष्पा दोस्तों और जान-पहचान वालों से उधारी लेकर टूर्नामेंट में हिस्सा लेने जाती हैं. प्रतियोगिता खत्म होने के बाद सब्जी बेचकर उधारी को चुकाती हैं. पुष्पा मिंज कहती हैं कि हर बार सोचती हूं कि अब खेलना बंद कर दूं. फिर तिरंगा आंखों के सामने लहराने लगता है. फिर मेरे भीतर से ये आग निकलती है- “मैं सब कुछ छोड़ सकती हूं लेकिन भारत के लिए खेलना नहीं छोड़ सकती.” पुष्पा की ये बातें न झकझोर देती हैं बल्कि पूरे सिस्टम पर सवाल भी खड़ा करती है.

बिना मदद अब भी नेशनल चैंपियनशिप की तैयारी
इस समय पुष्पा मिंज 23 और 24 अगस्त 2025 को तमिलनाडु के कोयंबटूर में होने वाली चौथी नेशनल पारा थ्रो बॉल चैंपियनशिप की तैयारी में जुटी हैं. तमाम मुश्किलों और बदहाली के बावजूद उन्होंने कमर कस रखी है. उनके शब्दों में हौसला देखिए, “इस बार भी गोल्ड लेकर ही लौटूंगी, चाहे कुछ भी हो जाए”. रांची के कडरू फ्लाईओवर के नीचे उनकी सब्जी की छोटा सी दुकान महज एक दुकान नहीं है, यह सपनों की दुकान है. यहां एक चैंपियन हर दिन अपनी पहचान को संभाल रही है. लोग सवाल कर रहे हैं और उनको जवाब चाहिए, सरकार और समाज से. क्यों एक गोल्ड मेडलिस्ट सब्जी बेचने को मजबूर है? पुष्पा मिंज जैसी बेटियों को सम्मान और आजीविका का स्थायी जरिया क्यों नहीं मिलता?
SACHIN